उच्चतम न्यायालय ने आज सहारा समूह की कंपनियों को निर्देश दिया कि वे एक
बॉन्ड योजना में लगाए गए निवेशकों के 24,000 करोड़ रुपये उन्हें वापस करें।
अदालत ने 31 अगस्त को इस योजना को अवैध करार दिया था।
समूह की जिन दो कंपनियों ने फंड जुटाए थे वे 5,120 करोड़ रुपये का डिमांड
ड्राफ्ट तत्काल सौंपेंगी और बाकी की रकम दो किस्तों में लौटाएंगी। पहली
किस्त 10,000 करोड़ रुपये की होगी जिसका भुगतान जनवरी के पहले हफ्ते में
किया जाएगा। यह रकम भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के पास जमा
कराई जाएगी। अदालत ने समूह को निवेशकों के दस्तावेज सौंपने के लिए 15 दिनों
की मोहलत दी है और कहा है कि अगर भुगतान पर निर्देश का पालन नहीं किया
जाता है तो समूह की संपत्तियां जब्त की जा सकती हैं।
मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों के पीठ ने
जो फैसला सुनाया है उसके अनुसार दूसरी किस्त फरवरी में दी जानी है। अदालत
ने अगस्त में जो फैसला सुनाया था उसके मुताबिक तकरीबन 3 करोड़ निवेशकों को
उनका पैसा लौटाने की आखिरी मियाद 30 नवंबर को पूरी हो चुकी है। अदालत ने
सहारा की ओर से इस विलंब पर अपनी गहरी नाराजगी जताई है।
आज का फैसला सेबी और एक निवेशक संरक्षण समूह के विरोधों के बीच सुनाया गया
जिसमें उन्होंने कहा कि उनकी बात पूरी तरीके से नहीं सुनी गई। सेबी ने आज
के फैसले पर सख्त एतराज जताया क्योंकि इस मामले में मुख्य फैसला एक दूसरे
पीठ ने दिया था और इसमें फेरबदल का अधिकार उसी को था। न्यायमूर्ति के एस
राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति के एस खेहर के पीठ ने मुख्य फैसला सुनाया था।
सोमवार को यह मसला मुख्य न्यायाधीश के पीठ के सामने उठाया गया था, मगर इसे
स्वीकार नहीं किया गया और मुख्य नयायाधीश ने कहा कि उनका पीठ निवेशकों के
हितों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुना रहा है। जब वरिष्ठ अधिवक्ता
अरविंद दातार ने सेबी की ओर से आज फिर यही मसला उठाया और अपील की कि अदालत
उनकी आपत्ति दर्ज करे तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'हम वही दर्ज करेंगे जो
हमें दर्ज करने लायक लगता है। जो भी आप कहें हम उसे दर्ज नहीं कर सकते।'
वहीं यूनिवर्सल इनवेस्टर्स एसोसिएशन के वकील विकास सिंह ने कहा कि अदालत ने
आश्वासन दिया है कि उसका आदेश निवेशकों के हित को सुरक्षित रखने के लिए
है, ऐसे में उनकी बात को सुने बिना फैसला देना उचित नहीं है। पीठ ने इस
अपील को नहीं माना और अपना फैसला सुना दिया।
फरवरी में दी जाने वाली दूसरी किस्त कितनी होगी यह स्पष्ट नहीं है, ऐसे
में अदालत के बाहर ये अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि इससे अनिश्चितता और
बढ़ेगी।
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